हाथियों के कदमों से फिर हरा होगा जंगल! उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की अनोखी पहल, AI और प्रकृति ने मिलाया हाथ JOHARPOST.IN | धमतरी-गरियाबंद, छत्तीसगढ़ उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) ने वन संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने की दिशा में एक ऐसी पहल शुरू की है, जो देशभर के वन प्रबंधन के लिए मिसाल बन सकती है। यहां आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तकनीक और प्रकृति के अपने तंत्र को जोड़कर जंगलों को फिर से समृद्ध बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इस अभियान की सबसे खास बात यह है कि हाथियों के प्राकृतिक व्यवहार को ही जंगलों के पुनर्जीवन का आधार बनाया गया है। वन विभाग इसे “एलीफेंट रेस्टोरेंट” और “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” जैसी अभिनव अवधारणाओं के जरिए आगे बढ़ा रहा है, ताकि भविष्य में वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक भोजन स्रोत आसानी से उपलब्ध हो सकें। AI बताएगा हाथियों का रास्ता, वहीं उगेंगे नए जंगल रिजर्व में मौजूद 40 से अधिक जंगली हाथियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने के लिए स्थानीय ग्रामीणों को विशेष प्रशिक्षण देकर एलीफेंट ट्रैकर्स बनाया गया है। ये ट्रैकर्स AI आधारित CGI Elephant Tracking & Alert App के माध्यम से हाथियों की लोकेशन और मूवमेंट की जानकारी रियल टाइम में दर्ज करते हैं। इस डेटा के आधार पर वन विभाग हाथियों के पारंपरिक मार्गों की पहचान कर रहा है, जिससे समय रहते अलर्ट जारी कर मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में मदद मिल रही है। हाथियों का गोबर बना जंगल बसाने का प्राकृतिक जरिया वन अधिकारियों के अनुसार हाथी जंगल में अनेक प्रकार के फल खाते हैं। उनके गोबर में मौजूद बीज प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रहते हैं और अंकुरित होने की क्षमता बनाए रखते हैं। ट्रैकर्स इन्हीं स्थानों से ताजा गोबर एकत्र करते हैं, जहां से आम, कुम्ही, केरमेट्टा सहित कई प्रजातियों के पौधे स्वाभाविक रूप से निकलते पाए गए हैं। इन पौधों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित कर विशेष क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं, जिन्हें “एलीफेंट रेस्टोरेंट” कहा जा रहा है। भविष्य में यही स्थान हाथियों के लिए प्राकृतिक भोजन केंद्र बनेंगे, जिससे वे खेतों और गांवों की ओर कम रुख करेंगे। हॉर्नबिल पक्षियों के लिए भी तैयार हो रहा विशेष भोजन क्षेत्र यह पहल केवल हाथियों तक सीमित नहीं है। वन विभाग ने स्थानीय युवाओं को हॉर्नबिल ट्रैकर्स के रूप में भी जोड़ा है। पिछले कुछ महीनों से वे केरमेट्टा, पाकड़, पीपल, बरगद और जंगली जामुन जैसे पेड़ों के बीज एकत्र कर रहे हैं। इन बीजों का चयनित वन क्षेत्रों में रोपण किया जा रहा है, जिससे भविष्य में हॉर्नबिल समेत अन्य फलाहारी पक्षियों और वन्यजीवों को पर्याप्त प्राकृतिक भोजन उपलब्ध हो सके। स्थानीय ग्रामीण बने जंगल संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत इस अभियान का सबसे सकारात्मक पक्ष स्थानीय समुदाय की भागीदारी है। जो ग्रामीण पहले हाथियों की आवाजाही से परेशान रहते थे, वही अब ट्रैकर, बीज संग्राहक, जैव विविधता संरक्षक और वन पुनर्स्थापना अभियान के सक्रिय सदस्य बन चुके हैं। वन विभाग का मानना है कि स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना वन संरक्षण के प्रयास लंबे समय तक सफल नहीं हो सकते। AI और वैज्ञानिक डेटा से होगी बेहतर वन योजना वन विभाग का कहना है कि यह परियोजना केवल पारंपरिक अनुभव पर आधारित नहीं है। AI आधारित ट्रैकिंग सिस्टम और फील्ड सर्वे से मिले आंकड़ों की मदद से उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है, जहां पौधारोपण और प्राकृतिक पुनर्स्थापना का सबसे अधिक लाभ मिलेगा। इससे जंगलों की पारिस्थितिकी मजबूत होगी और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास का विस्तार भी संभव होगा। मानव-हाथी संघर्ष कम करने की बड़ी उम्मीद विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जंगलों में हाथियों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक भोजन उपलब्ध रहेगा, तो वे खेती वाले इलाकों और गांवों की ओर कम जाएंगे। इससे फसल नुकसान, संपत्ति क्षति और मानव-हाथी संघर्ष जैसी घटनाओं में कमी आने की संभावना बढ़ेगी। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नई सोच वन विभाग के अनुसार हाथियों को लंबे समय से “जंगलों का माली” कहा जाता है, क्योंकि वे बीजों को दूर-दूर तक फैलाकर नए जंगलों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की यह पहल प्राकृतिक बीज प्रसार, आधुनिक तकनीक और सामुदायिक भागीदारी को एक मंच पर लाकर जैव विविधता संरक्षण और जलवायु अनुकूल वन विकास की दिशा में नया मॉडल प्रस्तुत कर रही है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में देश के अन्य हाथी प्रभावित वन क्षेत्रों में भी इसी मॉडल को अपनाया जा सकता है। Post navigation छत पर चल रहा था सोलर पैनल का काम… अचानक हुआ ऐसा कि दो युवकों की चली गई जान राजनांदगांव में महिला की निजी फोटो वायरल, इंस्टाग्राम से मचा बवाल! पढ़िए पूरा मामला