दुर्ग


गनियारी की बेटी को नम आंखों से विदाई, राजकीय सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को दुनिया के मंच तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण पंडवानी सम्राज्ञी तीजन बाई अब पंचतत्व में विलीन हो गईं। रविवार को उनके पैतृक गांव गनियारी (जिला दुर्ग) में पूरे राजकीय सम्मान और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया, पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा गया और हजारों लोगों की मौजूदगी में उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

उनके निधन के साथ केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि भारतीय लोक संस्कृति का एक स्वर्णिम अध्याय भी समाप्त हो गया। गांव की गलियों से लेकर देश-विदेश तक पंडवानी की गूंज पहुंचाने वाली यह महान कलाकार अब केवल अपनी अमर कला और यादों में जीवित रहेंगी।


रात 3:15 बजे रायपुर एम्स में ली अंतिम सांस

70 वर्षीय तीजन बाई पिछले काफी समय से अस्वस्थ थीं। उन्हें 27 मई से रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम लगातार उनका इलाज कर रही थी। शनिवार देर रात उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और रविवार तड़के करीब 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

सुबह लगभग 11 बजे उनका पार्थिव शरीर रायपुर एम्स से उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए हजारों लोग उमड़ पड़े।


कौन थीं तीजन बाई?

24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई पारधी समुदाय से थीं। आर्थिक रूप से बेहद साधारण परिवार में जन्म लेने वाली तीजन बाई ने कभी स्कूल की पढ़ाई नहीं की, लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचीं।

उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी डिग्री की मोहताज नहीं होती।


नाना से मिली महाभारत सुनाने की प्रेरणा

तीजन बाई के पिता का नाम चुनुकलाल और माता का नाम सुखवती था।

बचपन में वे अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कथाएं गाते और सुनाते देखती थीं। वहीं से उनके मन में पंडवानी के प्रति गहरा लगाव पैदा हुआ।

बाद में प्रसिद्ध लोक कलाकार उमेद सिंह देशमुख ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें विधिवत प्रशिक्षण दिया।


13 साल की उम्र में पहला मंच, फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा

सिर्फ 13 वर्ष की आयु में तीजन बाई ने अपना पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया।

उस दौर में महिलाओं को केवल बैठकर पंडवानी गाने की अनुमति थी, जिसे वेदमती शैली कहा जाता था। जबकि खड़े होकर अभिनय के साथ गाने वाली शैली कापालिक शैली केवल पुरुषों तक सीमित मानी जाती थी।

लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए पहली महिला के रूप में कापालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत की। शुरुआत में समाज ने इसका विरोध किया, यहां तक कि उन्हें समाज से बहिष्कृत भी कर दिया गया।

फिर भी उन्होंने अपनी कला नहीं छोड़ी और वही संघर्ष आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।


छत्तीसगढ़ से दुनिया तक पहुंची पंडवानी

अपनी दमदार आवाज, अभिनय और महाभारत के जीवंत मंचन के कारण तीजन बाई ने पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

उन्होंने भारत के अलावा अमेरिका, फ्रांस, जापान, इंग्लैंड, रूस, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में प्रस्तुति देकर दुनिया को छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति से परिचित कराया।

आज पंडवानी का नाम जिस सम्मान के साथ लिया जाता है, उसमें तीजन बाई का सबसे बड़ा योगदान माना जाता है।


कभी स्कूल नहीं गईं, फिर भी मिलीं चार डी.लिट. की उपाधियां

तीजन बाई बचपन में नियमित शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकीं।

बाद में साक्षरता अभियान के जरिए उन्होंने पांचवीं तक पढ़ाई की, लेकिन उनकी कला ने उन्हें देश-विदेश के विश्वविद्यालयों से चार मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (D.Litt.) की उपाधियां दिलाईं।


देश के तीन बड़े नागरिक सम्मान से हुईं सम्मानित

भारतीय लोक संस्कृति में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

प्रमुख सम्मान

  • पद्मश्री
  • पद्म भूषण
  • पद्म विभूषण (2019)
  • संगीत नाटक अकादमी सम्मान
  • नृत्य शिरोमणि
  • चार मानद डी.लिट. उपाधियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जताया गहरा शोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच X पर शोक संदेश जारी करते हुए कहा—

“तीजन बाई ने अपनी अद्भुत कला से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। उनका निधन भारतीय कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।”

प्रधानमंत्री ने इससे पहले नवंबर 2025 में स्वयं फोन कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी भी ली थी और हरसंभव सहायता का भरोसा दिया था।


मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बोले— छत्तीसगढ़ ने अपनी सांस्कृतिक पहचान खो दी

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि तीजन बाई ने पंडवानी के माध्यम से पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया।

उन्होंने कहा कि उनका निधन प्रदेश की लोक संस्कृति के लिए कभी न भरने वाली क्षति है।


पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हुए भावुक

अंतिम संस्कार में पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा—

“मैं स्कूल के दिनों में साइकिल चलाकर उनकी पंडवानी सुनने जाता था। आज एक महान कलाकार हमें छोड़कर चली गई।”

उन्होंने तीजन बाई को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बताया।


इन नेताओं और अधिकारियों ने दी श्रद्धांजलि

अंतिम दर्शन के दौरान बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद रहे।

श्रद्धांजलि देने वालों में शामिल रहे—

  • मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (शोक संदेश)
  • पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल
  • शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव
  • सांसद बृजमोहन अग्रवाल
  • विधायक अनुज शर्मा
  • विधायक ललित चंद्राकर
  • विधायक डोमनलाल कोर्सेवाड़ा
  • दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह
  • एसपी विजय अग्रवाल
  • संभाग आयुक्त सत्यनारायण राठौर
  • अन्य जनप्रतिनिधि एवं हजारों ग्रामीण

अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब

गनियारी गांव में हजारों लोग अपने प्रिय लोक कलाकार को अंतिम विदाई देने पहुंचे।

मुक्तिधाम में “चोला माटी के हे राम…” की गूंज के बीच लोगों की आंखें नम हो गईं। पूरे गांव में शोक का माहौल रहा।


भारत रत्न देने की उठी मांग

अंतिम संस्कार के दौरान ग्रामीणों और कई सामाजिक संगठनों ने तीजन बाई को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग उठाई।

ग्रामीणों ने गनियारी गांव में उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित करने की मांग भी की।


एक युग का अंत

गरीब परिवार की एक साधारण लड़की से लेकर पद्म विभूषण तक का सफर तय करने वाली तीजन बाई ने यह साबित कर दिया कि संघर्ष और प्रतिभा मिल जाए तो दुनिया की कोई ताकत रास्ता नहीं रोक सकती।

उनकी आवाज भले ही अब हमेशा के लिए शांत हो गई हो, लेकिन पंडवानी की हर गूंज में, महाभारत की हर कथा में और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के हर मंच पर तीजन बाई हमेशा जीवित रहेंगी।


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