जोहारपोस्ट डेस्क। आजकल की व्यस्त जीवनशैली में अक्सर माता-पिता इस बात से परेशान रहते हैं कि बच्चे उनकी बात नहीं मानते। ऐसे में गुस्से में आकर उन्हें डांटना आम बात हो जाती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि डांट-फटकार से बच्चों के व्यवहार में सुधार नहीं आता, बल्कि वे या तो जिद्दी हो जाते हैं या डर के कारण खुद को सीमित कर लेते हैं।

ऑप्शन देने से बढ़ता है सहयोग
सबसे पहले, बच्चों को आदेश देने के बजाय उन्हें विकल्प देना अधिक प्रभावी होता है। उदाहरण के तौर पर, “दूध पी लो” कहने के बजाय उनसे पूछें कि वे किस कप में दूध पीना पसंद करेंगे। इससे उन्हें अपनी पसंद का महत्व महसूस होता है और वे सहयोग करने लगते हैं।

शांत रहकर करें संवाद
दूसरा, बच्चों से दूर से चिल्लाने के बजाय उनके पास जाकर शांत स्वर में बात करना ज्यादा असरदार होता है। आंखों में देखकर की गई बातचीत बच्चों पर गहरा प्रभाव डालती है।

स्पष्ट नियम बनाएं
तीसरा, नियमों को स्पष्ट और सरल रखना जरूरी है। सामान्य बातें जैसे “शरारत मत करो” बच्चों को समझ नहीं आतीं। इसके बजाय उन्हें साफ निर्देश दें, जैसे खेलने के बाद खिलौने सही जगह रखना।

अच्छे व्यवहार की सराहना जरूरी
चौथा, बच्चों के अच्छे व्यवहार की सराहना करना बेहद जरूरी है। जब वे कोई सकारात्मक काम करें, तो उनकी तारीफ करें। इससे उनमें अच्छा व्यवहार दोहराने की आदत विकसित होती है।

हर बात पर ‘नहीं’ से बचें
पांचवां, हर बात पर ‘नहीं’ कहने से बचें। जरूरत होने पर ही रोकें और बाकी समय सकारात्मक भाषा का इस्तेमाल करें। इससे बच्चे आपकी बातों को अधिक गंभीरता से लेते हैं।

माता-पिता खुद बनें उदाहरण
अंत में, माता-पिता को खुद अपने व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि बच्चा अनुशासित और शांत रहे, तो आपको भी वैसा ही व्यवहार अपनाना होगा।

धैर्य और प्यार है सबसे जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की परवरिश एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें धैर्य, समझ और प्यार सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डांट-डपट से हटकर अपनाए गए ये तरीके बच्चों के व्यक्तित्व को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

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