दुर्ग के कचांदुर में आज भी निभाई जाती है सवनाही परंपरा, आधी रात को होता है गांव बांधने का अनोखा अनुष्ठान छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के ग्राम कचांदुर में सावन से पहले आधी रात को सवनाही (गांव बांधने) की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। जानिए इस प्राचीन लोक परंपरा, मान्यताओं और ग्रामीणों की आस्था की पूरी कहानी। सवनाही परंपरा दुर्ग। JOHARPOST.IN तेजी से बदलती दुनिया और आधुनिक तकनीक के दौर में भी छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। दुर्ग जिले के ग्राम कचांदुर में हर वर्ष सावन के आगमन से पहले एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे स्थानीय लोग ‘सवनाही’ या ‘गांव बांधना’ कहते हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस विशेष अनुष्ठान से गांव पर देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है और महामारी, प्राकृतिक आपदा, बीमारियों तथा अन्य अनिष्टों से पूरे गांव की रक्षा होती है। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि पूरे गांव की सामूहिक आस्था, एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाती है। आधी रात को शुरू होता है विशेष अनुष्ठान ग्रामीणों के अनुसार गांव बांधने की प्रक्रिया शनिवार और रविवार की मध्यरात्रि में शुरू होती है। जब पूरा गांव गहरी नींद में होता है, तब गांव के बैगा, बुजुर्ग और कुछ चुनिंदा ग्रामीण शीतला माता मंदिर में एकत्र होकर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा के बाद बैगा और बुजुर्ग नारियल, चावल, अगरबत्ती एवं अन्य पूजन सामग्री लेकर गांव की चारों दिशाओं की ओर निकलते हैं। वहां गांव की सीमा और देवी-देवताओं के स्थलों पर विधि-विधान से पूजा कर नारियल अर्पित किया जाता है। पूजा पूरी होने तक घरों से बाहर निकलने की मनाही इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि जब तक बैगा पूजा पूरी कर वापस नहीं लौटता, तब तक गांव के लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकलते। पूजा समाप्त होने के बाद गांव का कोटवार पूरे गांव में हांका लगाकर लोगों को सूचना देता है कि गांव बांधने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसके बाद ही ग्रामीण अपने घरों से बाहर निकलते हैं और सामान्य गतिविधियां शुरू होती हैं। घरों की दीवारों पर बनाए जाते हैं गोबर के निशान सवनाही के दौरान ग्रामीण अपने घरों के बाहर गोबर से विशेष धार्मिक चिन्ह भी बनाते हैं। इसे शुभ माना जाता है और मान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियां गांव में प्रवेश नहीं कर पातीं तथा परिवार सुरक्षित रहता है। चारों दिशाओं में होती है गांव की रक्षा की प्रार्थना ग्राम पंचायत कचांदुर के जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों के अनुसार गांव की चारों सीमाओं पर पूजा करने का उद्देश्य पूरे गांव, खेतों, पशुधन और लोगों की सुरक्षा की कामना करना होता है। पूजा के दौरान गांव में सुख-समृद्धि, अच्छी बारिश, भरपूर फसल और पूरे वर्ष शांति बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है परंपरा ग्रामीण बताते हैं कि उन्होंने बचपन से अपने बुजुर्गों को इस परंपरा का निर्वहन करते देखा है। नई पीढ़ी भी आज इसे उतनी ही श्रद्धा से निभा रही है, जितनी पहले निभाई जाती थी। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि गांव के सभी लोगों को एक सूत्र में जोड़ने वाली सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखना उनकी जिम्मेदारी है। महिलाओं की सहभागिता को लेकर अलग परंपरा गांव की पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार इस विशेष पूजा में केवल बैगा और गांव के कुछ बुजुर्ग ही शामिल होते हैं। महिलाओं की सीधी सहभागिता इस अनुष्ठान में नहीं होती। हालांकि वे घरों में रहकर गांव की खुशहाली और परिवार की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं। विज्ञान के दौर में भी कायम है अटूट विश्वास भले ही आधुनिक विज्ञान इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता, लेकिन ग्रामीणों के लिए सवनाही आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक है। उनका मानना है कि पूर्वजों से मिली इस विरासत ने वर्षों से गांव को एकजुट रखा है और यही कारण है कि आज भी यह परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। सवनाही परंपरा क्यों है खास? सावन से पहले आधी रात को किया जाता है विशेष अनुष्ठान। बैगा गांव की चारों सीमाओं पर जाकर पूजा करते हैं। पूजा पूरी होने तक ग्रामीण घरों से बाहर नहीं निकलते। कोटवार के हांका लगाने के बाद ही सामान्य गतिविधियां शुरू होती हैं। गांव, खेती, पशुधन और परिवार की खुशहाली की सामूहिक प्रार्थना की जाती है। पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा आज भी जीवित है। Post navigation सभापति रविशंकर चंद्रवंशी और जनपद सदस्य सुमन प्रदीप की पहल रंग लाई, विधायक भावना बोहरा ने कराया तत्काल समाधान रायपुर में शराब दुकानों के संचालन पर नया विवाद: इनोवसोर्स के कार्यालय, भर्ती प्रक्रिया और कथित सिंडिकेट पर उठे गंभीर सवाल