मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है, जहां अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के अहम सैन्य और स्पेस ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन हमलों का मुख्य उद्देश्य ईरान के उन तकनीकी केंद्रों को तबाह करना था, जो भविष्य में मिसाइल और हथियार कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल हो सकते थे।

हमलों में ईरान के सैटेलाइट डेवलपमेंट सेंटर, रक्षा मंत्रालय के ठिकानों और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़े बेस को निशाना बनाया गया। ये सभी संस्थान सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV) और बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक पर काम कर रहे थे, जिससे ईरान की सैन्य ताकत में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी।


खय्याम सैटेलाइट भी निशाने पर:
इजराइल डिफेंस फोर्सेस ने 8 मार्च को दावा किया कि उन्होंने “खय्याम” सैटेलाइट के कमांड और कंट्रोल सेंटर पर हमला किया। यह सैटेलाइट रोसकॉसमॉस द्वारा साल 2022 में लॉन्च किया गया था। इसके अलावा 16 मार्च को तेहरान के एक ऐसे कॉम्प्लेक्स को भी निशाना बनाया गया, जहां एंटी-सैटेलाइट हथियारों और मिलिट्री स्पेस प्रोग्राम पर काम चल रहा था।


मिसाइल क्षमता पर पड़ेगा असर:
विशेषज्ञों का मानना है कि सैटेलाइट और मिसाइल तकनीक में काफी समानता होती है। ऐसे में इन ठिकानों के नष्ट होने से ईरान की लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता को सीधा झटका लगेगा। पहले भी अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं कि ईरान का स्पेस प्रोग्राम इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) विकसित करने में मददगार साबित हो सकता है।


रूस-चीन पर बढ़ेगी निर्भरता:
इन हमलों के बाद अब ईरान की स्वदेशी सैटेलाइट निर्माण और लॉन्च क्षमता कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में उसे रूस और चीन जैसे देशों पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है। पहले से ही रूस ईरान को सैटेलाइट डेटा और सैन्य सहयोग देता रहा है।

विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका और इजराइल का मुख्य लक्ष्य ईरान को अंतरिक्ष आधारित सैन्य ताकत हासिल करने से रोकना और उसकी भविष्य की हमलावर क्षमता को सीमित करना है।

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