हाईकोर्ट्स को निर्देश—कोर्ट ऑर्डर में किसी भी हाल में न हो पहचान का खुलासा

नई दिल्ली। दुष्कर्म से जुड़े मामलों में पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी न्यायिक आदेश या दस्तावेज में पीड़िता या उसके परिवार की पहचान उजागर नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने इसे गंभीर कानूनी उल्लंघन बताते हुए कहा कि ऐसी लापरवाही पीड़िताओं के सम्मान और मानसिक स्थिति पर गहरा असर डालती है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान दोहराया कि 2018 के निपुण सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले में पहले ही यह तय कर दिया गया है कि किसी भी प्लेटफॉर्म—चाहे वह प्रिंट मीडिया हो, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या सोशल मीडिया—पर पीड़िता की पहचान सामने लाना प्रतिबंधित है। इसके बावजूद निचली अदालतों में इस दिशा में लापरवाही पर कोर्ट ने चिंता जताई।

अदालत ने यह भी बताया कि साल 1983 में भारतीय दंड संहिता में धारा 228A जोड़ी गई थी, जिसका मकसद यौन अपराधों की पीड़िताओं की पहचान को गोपनीय रखना है। इससे पहले इस तरह का स्पष्ट प्रावधान नहीं था, जिसके कारण कई मामलों में पीड़िताओं को सामाजिक तिरस्कार और मानसिक दबाव झेलना पड़ता था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति सभी हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित हो सके। यह टिप्पणी उस दौरान सामने आई, जब कोर्ट हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले की समीक्षा कर रहा था, जिसमें नौ साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोपी को बरी कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मामूली विरोधाभासों को आधार बनाकर गंभीर अपराधों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

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